Thursday, 5 January 2017

अस्तित्व

Astitva in Hindi

आज मैं आप सभी के समक्ष ऐसी बातें रखना चाहती हूँ, जो बेहद ही संवेदनशील है, जिन पर रखे गए विचार शायद कुछ लोगों को पसंद ना आये। पर मैं अपनी बात इस विषय पर किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु अपने विचार  रख रही हूँ, जिसे आप सभी को समझना और उसके भीतर छिपे विचार की गम्भीरता पर सही समय पर सार्थक कदम  उठाना,  बेहद जरूरी  है।

हर माता - पिता के लिए उसकी संतान अमूल्य वरदान होती है , जिसके जीवन को वह अपने हाथों से सजाते हैं व पूर्ण जिम्मेदारी के साथ उनका ख्याल रखते हैं। एक पल भी अपने आप से जुदा नहीं होने देते हैं। अपने संतान की छोटी से छोटी जरूरत को पूरा करना अपना उत्तरदायित्व समझते हैं और उनकी  बड़ी से बड़ी फरमाईश को पूरा करने में अपना जी जान लगा देते हैं। संतान के आँखों में एक आँसू का कतरा भी आये, ऐसा उन्हें गवारा नहीं होता।  यहाँ मैं आप सभी से पूछना चाहती हूँ  कि जिस संतान का हम पूर्ण रूप से ख्याल रखते हैं, क्या हम ऐसा व्यवहार करके उनके साथ धोखा नहीं कर रहे ?  क्या हमने इस बात को कभी सोचा है कि जिस दिन हम  अपनी संतान को छोड़ कर दुनियाँ से रुखसत होंगे, उस दिन क्या वही संतान अपना जीवन जीने में समर्थ हो सकेगी, अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभा सकेगी ? जिस संतान को हम दुःखों की धूप से बचाकर रखते है, वह क्या हमारे ना रहने पर दुखों और मुश्किलों की धूप से ठण्डी छाँव  की तलाश करने में समर्थ हो पायेगी ? कभी नहीं।

हम अपने स्वार्थ और प्रेम में इतने अंधे हो जाते हैं कि अपने बच्चे को जीवन की वास्तविकता से परिचित कराना ही भूल जाते हैं। एक बार सोचिये कि क्या हमारा उत्तरदायित्व नहीं बनता कि हम अपने बच्चे के अस्तित्व की तलाश करने में उनकी मदद करें ? उनको खुद जीवन जीने लायक बनाये। उनको उस काबिल बनने का अवसर प्रदान करें कि वह खुद समर्थ हो सके ताकि जीवन के हर मोड़ पर समझदारी के साथ अपना निर्णय लेने में समर्थ हो सके।

हर माता -पिता को इस बात का विशेष ख्याल रखना चाहिए कि किसी चीज की अधिकता हमारे लिए विष के सामान होती है - चाहे वह प्रेम ही क्यों ना हो ! क्योकि जल जब सीमा में होता  है तो हमें जीवन देता  है, हमारी प्यास बुझाता  है, हमारी जीवन जरूरते पूरी करता  है। पर वही जल जब अपनी सीमा को लाँघता  हुआ, अपना विकराल रूप धारण करता  है तो विनाश का कारण भी बन जाता  है। यहाँ मैं बस यही आप सभी से कहना चाहती हूँ  कि अपने बच्चे से प्रेम करे पर उनको मजबूत बनने का अवसर भी उन्हें प्रदान करें। उन्हें अपने अस्तित्व की तलाश स्वयं करने दें ताकि वह अपने पैर पर खड़े हो सके- एक सशक्त वृक्ष की तरह, जिसे आंधी तूफान बारिश भिगो तो सके पर उनके जड़ो को आहत ना कर पाए। अपने बच्चे को प्रेम की छाँव के साथ जिम्मेदारियों की धूप का अहसास करना भी माता - पिता की ही जिम्मेदारी  होती है।  

और कहते हैं ना कि जब हम अस्वस्थ होते हैं तो हमें कड़वी से कड़वी दवा भी पीनी पड़ती है और ये दवाएँ अपना असर दिखा कर हमें फिर से पूर्ण रूप से स्वस्थ कर देती हैं।  उसी प्रकार से, हमें अपने सन्तान को भी जीवन के  सभी कड़वे अनुभवों का  सामना करने देना चाहिए, जिससे धीरे-धीरे वह भी जीवन की वास्तविकता को समझ सके, अपने जीवन का मूल्य समझ सके और आगे मजबूत बनकर अपने अस्तित्व में किसी का जीवन संवार सके। यहाँ तक कि  खुद का अस्तित्व मिटने के बाद भी किसी के काम आ सके। 

9 comments:

  1. रश्मि जी ,

    नया साल आपको और आपके पाठकों को बहुत बहुत मुबारक हो !

    हमारा इंतजार ख़त्म हुआ और नए साल में आपकी पहली रचना हमारे सामने है।

    सही कहा आपने, माता पिता को अपने बच्चों का शरीर इतना नहीं सहलाना चाहिए कि उसकी रगड़ से खून निकलने लगे। प्यार-पुचकार उतना ही होना चाहिए जितनी जरुरत हो। जरुरत से ज्यादा लाड़ प्यार से बच्चे बिगड़ जाते हैं, ऐसा बड़े बुजुर्गो ने कहा है। लेकिन आज के माँ बाप बच्चों की हर जरुरत पूरी करने के चक्कर में अपनी पूरी जिंदगी ही गुजार देते हैं।

    आपकी रचना जीवन की बड़ी सीख को उजागर करती है।


    आपका पाठक

    मृत्युंजय

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    1. शुक्रिया मृत्युंजय जी, आपको भी नव वर्ष की शुभकानाएँ, आपने हमेशा ही मेरी कोशिश को सराहा है जिसके लिए मैं आपकी दिल से आभारी हूँ, सुंदर विचार के लिए धन्यवाद ....

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  2. आपकी रचना बहुत सुन्दर है। हम चाहते हैं की आपकी इस पोस्ट को ओर भी लोग पढे । इसलिए आपकी पोस्ट को "पाँच लिंको का आनंद पर लिंक कर रहे है आप भी कल शुक्रवार 6 जनवरी 2017 को ब्लाग पर जरूर पधारे ।

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    1. विरम जी, आपने मेरी रचना को अपने विचार प्रदान कर सार्थक बना दिया, मेरी कोशिश को लिंक के माध्यम से आगे बढ़ाने के लिए आभार....

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  3. Replies
    1. सुशील जी, आपने अपना बहुमूल्य विचार मेरी रचना को दिया आपका धन्यवाद, एक नई दिशा को आपके विचार का आगे भी इंतजार रहेगा आपका आभार ...

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  4. बहुत ही संवेदनशील और सार्थक विषय पर लेख लिखा है आपने। इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। सोचने पर मजबूर करता है यह लेख।

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    1. ज़मशेद जी, आपके विचार के लिए आभार,आगे भी अपने विचार से मुझे अवगत कराते रहिएगा.....

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  5. सार्थक एवं संवेदनशील पोस्ट , नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें ।

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